रानी लक्ष्मी बाई के बारे में जानकारी 2021 | Rani laxmibai information in hindi

दोस्तों आज मैं आपको इस ब्लॉग में बताने वाला हूं रानी लक्ष्मी बाई के बारे में अर्थात आज का हमारा विषय है rani laxmibai information in hindi। रानी लक्ष्मीबाई का नाम सुना तो सभी मनुष्यों ने है लेकिन उनके बारे में लोगों को अत्यधिक जानकारी ना होने की वजह से गुगल पर प्रतिदिन इस तरह के सर्च होते रहते हैं जैसे कि jhansi ki rani in hindi , jhansi ki rani history in hindi

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रानी लक्ष्मी बाई के बारे में जानकारी | Rani laxmibai information in hindi | jhansi ki rani in hindi

रानी लक्ष्मी बाई के बारे में जानकारी 2021 | Rani laxmibai information in hindi

रानी लक्ष्मी बाई का जन्म 19 नवंबर 1828 में वाराणसी में हुआ था हुआ था। रानी लक्ष्मी बाई का बचपन का नाम मणिकर्णिका था लेकिन सभी लोग उनको प्यार से मनु नाम से पुकारते थे। रानी लक्ष्मी बाई के माता का नाम भागीरथी बाई था तथा उनके पिताजी का नाम मोरोपंत तांबे था। महारानी लक्ष्मी बाई जी के पिताजी एक मराठा थे और वह मराठा बाजीराव की सेवा में थे लेकिन उनकी माता भागीरथी भाई एक सुसंस्कृत बुद्धिमान और धर्म निष्ठावान महिला थी लेकिन कुछ दिन पश्चात ही उनकी मां की मृत्यु हो गई जिस वजह से रानी लक्ष्मीबाई की देखरेख करने के लिए किसी भी व्यक्ति का ना होना।

तब उनके पिता उनको अपने साथ पेशवा बाजीराव द्वितीय राज दरबार ले जाने लगे और वहां पर उनको एक नया नाम मिला छबीली क्योंकि रानी लक्ष्मीबाई बहुत चंचल और सुंदर थी। रानी लक्ष्मीबाई बचपन में शास्त्रों और शस्त्र दोनों की शिक्षा ली थी।

रानी लक्ष्मीबाई का विवाह 14 वर्ष अर्थात 1842 में मराठा साम्राज्य के राजा गंगाधर राव नेवालकर के साथ कर दिया गया। और वह झांसी की रानी बनी विवाह के बाद इनका नाम लक्ष्मी बाई रखा जो वर्तमान समय में हम रानी लक्ष्मी बाई के नाम से जानते हैं। रानी लक्ष्मीबाई ने सन 1851 में दिसंबर माह में एक पुत्र को जन्म दिया लेकिन 4 वर्ष के बाद उस पुत्र की मृत्यु हो गई। उस पुत्र की मृत्यु के बाद सन 1853 में उनके पति राजा गंगाधर राव का स्वास्थ्य बहुत अधिक बिगड़ जाने की वजह से लोगों ने उनको यह सलाह दी कि उन्हें दत्तक पुत्र लेना चाहिए।

जब रानी लक्ष्मीबाई और राजा गंगाधर राव ने पुत्र को गोद लिया उसके पश्चात 21 नवंबर 18 सो 53 में राजा गंगाधर राव की मृत्यु हो गई लेकिन उन दोनों ने जिस पुत्र को गोद लिया था उसका नाम दामोदर राव रखा।

सन 18 सो 57 में झांसी संग्राम का एक मुख्य केंद्र बन जाने की वजह से वहां पर बहुत ज्यादा हिंसा भड़क गई थी लेकिन रानी लक्ष्मीबाई ने झांसी की सुरक्षा करने के लिए स्वयं सेवक सेना का संगठन प्रारंभ किया इस सेना में महिलाओं को शामिल किया जा रहा था और उनको युद्ध के सभी अदाओं पर और प्रशिक्षण दिया जा रहा था इस संग्राम में झांसी की साधारण जनता ने भी बहुत सहयोग दिया।

सितंबर और अक्टूबर के महीने में सन 18 सो 57 में झांसी का पड़ोसी राज्य परीक्षा तथा दतिया के राजाओं ने उस पर आक्रमण कर दिया लेकिन वहां पर मौजूद रानी लक्ष्मीबाई ने उनके इस प्रयास को पूरी तरह से विफल कर दिया।
इस संग्राम के बाद सन 18 सो 58 के जनवरी माह में ब्रितानी ने झांसी के ऊपर हमला किया और दो हफ्तों की लड़ाई के बाद ब्रितानी सेना ने झांसी राज्य पर कब्जा कर लिया लेकिन झांसी की रानी एवं उनके पुत्र दामोदर रावत दोनों अंग्रेजों से बचकर भागने में सफल रहे और वह भागते हुए कालपी पहुंचे और तात्या टोपे जी से मिले।

तात्या टोपे ने रानी लक्ष्मी बाई के साथ मिलकर संयुक्त सेनाओं में ग्वालियर के विद्रोही सेनाओं की मदद से वहां के ग्वालियर के किले पर कब्जा कर लिया। 18 जून 858 में कोटा की रियासत में ब्रितानी सेना से लड़ते लड़ते रानी लक्ष्मीबाई की मृत्यु हो गई।

झांसी की रानी बचपन में ही पेशवा बाजीराव के दत्तक पुत्र से पिस्तौल चलाना सीख लिया था उनको बचपन में घुड़सवारी तलवारबाजी में निपुणता हासिल थी जो लोगों को चौंका दिया करती थी।

रानी लक्ष्मीबाई को बचपन से ही व्यू रचना करना किले से गिरना तलवारबाजी बरछी कटार हत्या चलाने का खेल खेला करती थी यही खेल को बेहद पसंद आता था। रानी लक्ष्मीबाई का नाम झांसी की रानी इसलिए पड़ा क्योंकि वहां झांसी के मराठा शासक से उनकी शादी हुई थी।

महारानी लक्ष्मीबाई महाराष्ट्रीयन कराडे ब्राह्मण परिवार से थी। रानी लक्ष्मीबाई अपनी वीरता के लिए बहुत ज्यादा प्रसिद्ध थी वह महिलाओं को भी शास्त्र और युद्ध कला क्या परीक्षण करवाती थी।

रानी लक्ष्मी बाई के पति गंगाधर राव की दो पत्नियां थी जिसमें से रानी लक्ष्मीबाई दूसरी पत्नी थी और उनकी पहली पत्नी का नाम रमाबाई था इनकी मृत्यु गर्भावस्था के दौरान हो गई थी उसके पश्चात गंगाधर राव की दूसरी शादी हुई रानी लक्ष्मीबाई जी से।

झांसी की रानी के पास मुख्यतः तीन घोड़े थे अर्थात वह तीन घोड़ों का प्रयोग कर दी थी इन का नाम पवन बादल और सारंगी था। कुछ लोगो का ऐसा मानना है की जब रानी लक्ष्मीबाई ने बादल पे सवार होकर महल की दीवार से कूदी तो बादल ने रानी लक्ष्मीबाई बाई की जान बचाने के लिए अपनी जान दे दी उसके पश्चात रानी लक्ष्मीबाई बाई ने पवन घोड़े का इस्तेमाल करने लगी।

रानी लक्ष्मीबाई बाई जब 31 वर्ष की थी तब उनकी मौत हो गई।झांसी की रानी अपनी वीरता की वजह से पूरे देश में विख्यात हो गई। इनकी वीरता पूरे देश भर में प्रसिद्ध हो गई और यह कई सारे युद्ध जीते जिस वजह से इनका नाम आज के इतिहास में लिखा गया है रानी लक्ष्मीबाई मरने के बाद भी लोगों के दिलों में जीवित रहती हैं।

रानी लक्ष्मी बाई के लिए एक बहुत ही प्रसिद्ध कविता है जो सभी बच्चों के बहुत से आप सुनते होंगे वह थी बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी।

झांसी की रानी एक महिला होने के बावजूद भी शस्त्र और शास्त्र दोनों में बहुत निपुण थी जिस वजह से वह एक वीर की तरह जीवित रही और उसी तरह अपने प्राण त्यागे।

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निष्कर्ष

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